जमींदारी / स्थायी / इस्तमरारी व्यवस्था से संबंधित महत्वपूर्ण GK | Zamindari System GK

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Zamindari System GK

➤ 1790 में कॉर्नवालिस ने एक 10 वर्षीय भू – राजस्व व्यवस्था लागू की , जिसमें भूमि का स्वामी तथा लगान वसूली का अधिकारी ज़मींदार को ही माना गया । अत : इसे ज़मींदारी / मालगुजारी व्यवस्था भी कहते हैं ।

➤ 1793 में कॉनवालिस ने 10 वर्षीय व्यवस्था को बदलकर स्थायी कर दिया क्योंकि उसका आकलन था कि भू – राजस्व संबंधी प्रयोगों के लिये 10 वर्ष का समय अल्प है ।

➤ राजस्व के कर ( लगान ) का स्पष्ट विभाजन सरकार एवं ज़मींदारों के बीच किया गया । इसके अंतर्गत लगान वसूली का 10/11 भाग सरकार का तथा शेष 1/11 भाग ज़मींदारों हेतु नियत किया गया ।

➤ इस व्यवस्था की सबसे बड़ी खामी यह थी कि यह स्पष्ट नहीं किया गया कि ज़मींदार किसानों से कितना लगान वसूल करें फलतः अधिक लगान वसूली का फायदा ज़मींदारों को मिला , सरकार को नहीं और इसका यह परिणाम हुआ कि ज़मींदारों का किसानों पर शोषण बढ़ने लगा ।

➤ 1793 के विनियम -14 द्वारा सरकार को ज़मींदार की संपत्ति जब्त करने का अधिकार मिला और 1794 में ‘ सूर्यास्त का नियम ‘ लागू कर दिया गया , अर्थात् नियत समय तक यदि सरकार के पास लगान या राजस्व नहीं पहुँचा तो उसकी ज़मींदारी नीलाम कर दी जाएगी ।

➤ यह व्यवस्था ( ज़मींदारी ) भारत के 19 प्रतिशत भाग पर लागू की गई , जिसमें बंगाल , बिहार , उड़ीसा के अतिरिक्त बनारस व उत्तरी कर्नाटक के क्षेत्र शामिल थे ।

प्रभाव: जमींदारी / स्थायी / इस्तमरारी व्यवस्था का प्रभाव

➤ 1812 तक संशोधनों के द्वारा ज़मींदारों को यह अधिकार दे दिया गया कि लगान न देने वाले किसानों की ज़मीन बिना न्यायालयों की पूर्व अनुमति के वे ज़ब्त कर सकते हैं । इससे किसान अब कृषक दास में बदलने लगे ।

➤ ‘ सूर्यास्त के नियम ‘ के कारण नए वर्गों , जैसे – व्यापारी , साहूकार आदि ज़मीन खरीदकर ज़मींदार बनने लगे , जिससे अनुपस्थित या दूरवासी ज़मींदारी का उदय हुआ ।

➤ जमीनों की नीलामी के कारण उपसामंतीकरण का उदय हुआ ।

➤ स्थायी होने के कारण कृषि की अनुकूल या प्रतिकूल पैदावार होने के बावजूद इसकी दरों में परिवर्तन नहीं किया गया , जिससे सरकार को भी हानि हुई ।

➤ अंग्रेज़ों को यह लाभ तो हुआ ही कि उन्हें स्थायी रूप से लगान की सुनिश्चितता प्राप्त हो गई , जिसका प्रयोग उन्होंने साम्राज्य विस्तार व स्थिरीकरण में किया और कृषि व्यवस्था में निवेश या ध्यान न देकर सारा ध्यान व्यापार की उन्नति में लगाया ।

➤ ध्यातव्य है कि 1784 के पिट्स इंडिया एक्ट में ज़मींदारों द्वारा लगान वसूली को मान्यता दी गई थी । अतः इस व्यवस्था को समर्थन मिला ।

➤ अभी अंग्रेज़ों को न तो भारतीय कृषि व्यवस्था का ज्ञान था और न ही उनके पास इतने अधिकारी थे कि वे अपने दम पर राजस्व व्यवस्था को चला सकें ।

➤ अंग्रेज़ों को भारत में ज़मींदारों के रूप में एक सामाजिक मित्र मिल गया , जो दिल से चाहता था कि अंग्रेज़ यहाँ बने रहें । इसीलिये 1857 के महाविद्रोह में ज़मींदारों ने अंग्रेज़ों का साथ दिया ।

➤ इस भू – राजस्व प्रणाली के लागू होने के बाद कानूनी विवादों की प्रवृत्ति में भी बढ़ोतरी हुई ।

नोट : आर.सी. दत्त व राजा राममोहन राय जैसे विद्वान इस व्यवस्था के समर्थक थे । आर.सी. दत्त ने तो इसे पूरे भारत में लागू करने की अनुशंसा की ।

• परवर्ती काल में 1945 की ज़मींदारी व्यवस्था की जाँच के लिये ‘ फ्लाउड कमीशन ‘ की रिपोर्ट में कहा गया कि इस व्यवस्था में अनेक खामियाँ हैं । अर्थात् इस रिपोर्ट में स्थायी बंदोबस्त की आलोचना की गई ।

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